होली…
फाल्गुन पूर्णिमा को मनाए जाने वाले त्यौहार होली से तो आप सभी लोग भली भांति परिचित हैं ही। सभी को ज्ञात है कि होली ही के दिन अधर्म पर धर्म की विजय हुई थी।
हिरण्यकश्यप नामक राजा ने अपने आप को स्वयंभू भगवान् घोषित कर दिया मगर उसके अपने ही पुत्र प्रह्लाद ने उसको भगवान् मानने से इंकार कर दिया तो उसे सबक सिखाने के लिए हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका, जो इंजीनियरिंग ग्रेजुएट थी, की गोद में प्रह्लाद को बैठा कर आग के हवाले कर दिया।
होलिका के पास एस्बेस्टस से बना एक फायर प्रूफ सूट था। हिरण्यकश्यप ने सोचा कि मेरी बहन होलिका तो बच जायेगी और मुझे भगवान ना मानने वाला प्रह्लाद जल मरेगा। मगर बालक प्रह्लाद की बुआ होलिका उसे बहुत प्यार करती थी इसलिए उसने अपना फायर प्रूफ सूट प्रह्लाद को पहना दिया। आग में होलिका तो मर गयी मगर भक्त प्रह्लाद का बाल भी बांका ना हुआ। ऐसी बुआ को शत शत नमन है।
इसके अलावा भी कई और घटनाएं होली ही के दिन घटित हुई थी जो ज्यादातर लोगों के संज्ञान में नहीं हैं।
सबसे पहले बात करते हैं महादेव और कामदेव की।
एक बार महादेव मैडिटेशन में लीन हो गए। संसार की सुध बुध लेनी छोड़ दी। स्वर्ग की भी पब्लिक परेशान। तब सभी देवताओं ने आपात बैठक की और गोल मेज सम्मेलन करके कामदेव जी को यह असाइनमेंट दिया कि भाई जाओ और तपस्या में रायता फैलाओ।
कामदेव तुरंत तैयार। स्त्री रूप धर कर पहुँच गए खन खन चूड़ियाँ खनखनाते महादेव के चैम्बर में। और फिर वही हुआ जो अक्सर हो जाता है। महादेव की तपस्या भंग हो गई और वह क्रोधित हो गए और झट से अपना तीसरा नेत्र खोला और कामदेव भस्म। यह घटना भी होली के ही दिन घटित हुई थी।
कालान्तर में इसी रायता फैलाने वाले कामदेव ने मनुष्य रूप में जन्म लिया और सुना है कि आजकल वह युगपुरुष के नाम से जाने जाते हैं और अभी दिल्ली में खूब रायता फैलवाया।
उसके बाद एक और घटना है यशोदानंदन की। श्री कृष्णा जी तो बचपन से ही नॉटी थे। पूतना वध आपको याद है ना। होली के ही दिन किया गया था, नॉटी कृष्णा द्वारा। सुना है उस पूतना ने कलियुग में फिर से अवतार लिया है और कई बार 'ज.ला.ने.' विश्वविद्यालय के आसपास विचरण करती पाई गई है।
श्री भगवान जी बड़े हुए तो राधा रानी को प्रेम रंग में सरोबार कर दिया। उसी की याद में आज भी बृज में पंद्रह दिन तक होली खेली जाती है जो रंगपंचमी के दिन समाप्त होती है।
मुझे आज भी याद है बचपन में हम टेसू के पत्ते पकाकर गीला रंग बनाया करते थे। आलू के ठप्पे बनाया करते थे जिन पर लिखा होता था ‘गधा’, ‘चोर’। थोडा बड़ा आलू हत्ते चढ़ गया तो ‘पागल’।
सुना है चीनी लोगों ने छपाई कला हम भारतीयों के होली वाले ठप्पे देख देख कर ही सीखी थी। ठप्पे पर बड़ी सावधानी से कालिख़ लगाई जाती थी और फिर कुर्ते की जेब में उसे डालकार निकल पड़ते थे मुर्गे की तलाश में और जब तक आठ दस मुर्गे हलाल ना कर दे तो चैन नहीं आता था।
कभी कभी कड़कनाथ टाइप का मुर्गा मिल गया तो वो हमारा ठप्पा हमसे छीनकर हमें ही लगा देता था। मगर मन ही मन हम भी तो यही चाहते थे कि कोई हमें भी तो ठप्पा लगाए।
कुछ खतरनाक टाइप की आंटियां भूत बना कर ही छोड़ती थी। दो बजे के बाद बारी आती थी घिस घिस कर रंगों को उतारने की। मगर अब वो दिन कहीं खो से गए हैं…..कभी लौटेंगे!!!!!! शायद….शायद नहीं….शायद….
No comments:
Post a Comment